💐💐आज का विचार💐💐

जहाँ प्रेममें स्वार्थका भाव आया

वहीं प्रेमका टूटना शुरू हो जाता

है, वास्तवमें स्वार्थ और अहंकार

ये दोनों ही प्रेममार्गमें बड़ेबाधक

हैं, आप सेवा करके किसी को

रोग आदि से बचातें हैं, दृव्यादि

से किसी की विपत्तिका समन

करतें हैं, ये सभी हितपूर्ण कार्य

प्रेमकी वृद्धि में परम् सहायक है,

किन्तु आप इन सेवाओंको यदि

किसीके सामने प्रकट कर देते है,

तो सब किया कराया मिटटी हो

जाता है, इसलिए किसीकी सेवा

या उपकार करके उसे कहना

नहीं चाहिए, क्योंकि अपने द्वारा

किये उपकारोंको प्रकट करनेसे

अभिमान की वृद्धि होती है, और

अभिमानको कोईभी सहन नहीं

कर सकता, मनुष्य स्वयं चाहे

अहंकारका शिकार बना रहे,

किन्तु वह दूसरेके अहंकारको

सहन नहीं कर सकता, अतः प्रेम

को बढाने और उसे स्थिर रखने

के लिए निस्वार्थ एवं निरभिमान

होकर सबके हितमें रत रहना चाहिए।

 

विजय ठाकरे