इस खाखी रंग की कुछ बात तो है,

लगता है देश की मिट्टी से करती ये सीधा संवाद है,

आखिर रंग है दोनों का एक समान,

क्यूं ना मां भारती को हो फिर इस पर अभिमान,

धूप में तपकर, बारिश में भीगकर,

हमने खाखी के फर्ज को पूरा किया,

रोटी का निवाला भी छूट गया,

फिर भी हमने उफ ना किया,

भूख ना लगती रोटी की,

भूखे तो हम इज्जत के हैं,

कोई एक बार शाबाशी देदे,

भुला देते सारे गम हैं,

छोड़ आते परिवार को पीछे,

जब घर से रोज निकलते हम,

देश जब भी पुकार है देता,

सीना तान खड़े हो जाते हम,

घर की याद तो आती है,

बच्चों की याद भी बहुत सताती है,

पर समझ नहीं आया आज तक ये,

कि ये हिम्मत कहां से आती है,

लगता है ये जोश उस शेर का है,

जो सजा रहता है मस्तक पर,

या हो सकता है ये आशीर्वाद हो उन तारों का,

जो टिमटिमाते हैं हमारे कंधों पर।

विजय ठाकरे

अध्यक्ष, दा इंसपायर्ड फाउंडेशन